स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली: जिला अस्पताल में मरीज बेहाल, पंखा खराब तो कहीं आईसीयू में एसी फेल
बस्ती जिला अस्पताल या यातना गृह? बदहाली के आगे दम तोड़ रही मानवता! "रात भर जैसे-तैसे काम चला लीजिए": जिला अस्पताल में इलाज के नाम पर सिर्फ तमाशा!
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती का ‘रेफर सेंटर’ बना जिला अस्पताल: बदहाली के आगे दम तोड़ता स्वास्थ्य तंत्र
- बस्ती स्वास्थ्य विभाग की खुली पोल: पंखा खराब, आईसीयू फेल और भगवान भरोसे मरीज!
- बस्ती जिला अस्पताल की बदहाल व्यवस्था: एक बेड पर दो बच्चे, आईसीयू में बंद हैं एसी
- स्वास्थ्य सेवाओं की ‘ICU’ में मौत: सुविधाओं के अभाव में इलाज के बिना लौटने को मजबूर तीमारदार
- सरकारी अस्पताल का सच: लाखों के बजट के बाद भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे मरीज
- बदहाल जिला अस्पताल पर भड़के शिवसेना जिला प्रभारी: कहा- “क्या इलाज के लिए जमीन-जायदाद बेचें?”
- शिवसेना की चेतावनी: जिला अस्पताल की व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो होगा बड़ा आंदोलन
- प्रमोद पांडे का प्रशासन पर हमला: जिला अस्पताल में मरीजों से बदसलूकी और सुविधाओं का घोर अभाव
बस्ती। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश में ‘बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं’ के दावों के बीच, बस्ती जिला अस्पताल का चिल्ड्रेन वार्ड भ्रष्टाचार और लापरवाही का वीआईपी (VIP) अड्डा बन गया है। शनिवार रात को सामने आई घटना ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर न केवल सवाल उठाए हैं, बल्कि यह साबित कर दिया है कि यहाँ आने वाले मरीज इलाज के लिए नहीं, बल्कि अपनी किस्मत भरोसे आते हैं।प्रदेश सरकार भले ही सरकारी अस्पतालों में विश्वस्तरीय सुविधाओं का दावा कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। बस्ती जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खुल गई है। शिवसेना के जिला प्रभारी प्रमोद पांडे ने अपने 4 साल के बीमार बच्चे के इलाज के दौरान अस्पताल की बदहाली का जो अनुभव साझा किया, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने के लिए काफी है।
व्यवस्था की ‘मौत’ का मंजर
शिवसेना के जिला प्रभारी प्रमोद पांडे ने जो तस्वीरें बयां की हैं, वे अस्पताल प्रबंधन के चेहरे से नकाब उतारने के लिए काफी हैं। शनिवार रात जब वे अपने 4 साल के बीमार बच्चे को लेकर ट्रॉमा सेंटर पहुंचे, तो शुरुआती उपचार के नाम पर उन्हें चिल्ड्रेन वार्ड के हवाले कर दिया गया। लेकिन वार्ड के अंदर का नजारा किसी ‘नर्क’ से कम नहीं था।
घटना के प्रमुख बिंदु:
- पंखों का दम तोड़ना: भीषण उमस के बीच, जिस बेड पर बीमार बच्चे को लिटाया गया, उसका पंखा महीनों से खराब पड़ा था। जिम्मेदार कर्मचारी आराम फरमाते रहे और बच्चा गर्मी से बिलखता रहा।
- बेड की किल्लत और अमानवीयता: 6 लाख की आबादी वाले इस जिले के अस्पताल में ‘इकोनॉमी’ का गलत मतलब निकाला जा रहा है। एक बेड पर दो बीमार बच्चों को भर्ती करना यह दर्शाता है कि मरीजों की जान की कोई कीमत नहीं है।
- आईसीयू का सच: जब आईसीयू में शिफ्ट किया गया, तो वहां का हाल और भी भयावह था। जीवन रक्षक वार्ड में एसी बंद थे। केवल दिखावे के लिए एक एसी चल रहा था, जिसके नीचे डॉक्टर खुद को सुरक्षित मान रहे थे, जबकि मासूम मरीज घुटने को मजबूर थे।
“रात काट लीजिए” – यह अस्पताल है या यातना गृह?
सबसे शर्मनाक पहलू तब सामने आया जब जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों का रुख सामने आया। जब प्रमोद पांडे ने पंखा ठीक कराने की शिकायत की, तो जवाब मिला— “रात भर जैसे-तैसे काम चला लीजिए।” यह महज एक कर्मचारी का बयान नहीं है, बल्कि यह जिला अस्पताल की संस्कृति बन चुकी है। सीएमएस और उनकी टीम ने भी समाधान देने के बजाय ‘रात काटने’ का सुझाव देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। एक ऐसे अस्पताल में जहां पल-पल कीमती होती है, वहां प्रशासन की यह संवेदनहीनता सीधे तौर पर मरीजों के प्रति आपराधिक लापरवाही है।शनिवार रात करीब साढ़े आठ बजे प्रमोद पांडे अपने बीमार बच्चे को लेकर जिला अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर पहुंचे। इलाज के लिए भर्ती तो कर लिया गया, लेकिन असल समस्या तब शुरू हुई जब वे बच्चे को लेकर चिल्ड्रेन वार्ड में पहुंचे। वहां का हाल देखकर उनके होश उड़ गए। जिस बेड पर उनके बच्चे को लिटाया गया था, उसका पंखा ही खराब था। चिलचिलाती गर्मी में नन्हा बच्चा बेहाल था। जब उन्होंने इस बारे में वहां तैनात कर्मचारियों से गुहार लगाई, तो उन्हें संवेदनहीन जवाब मिला— “रात भर जैसे-तैसे काम चला लीजिए।”
एक बेड पर दो बच्चे, फिर आईसीयू में भी अव्यवस्था
हैरानी तो तब और बढ़ गई जब पता चला कि यहां एक ही बेड पर दो-दो बच्चों को भर्ती किया गया है। यह केवल एक पंखे की बात नहीं थी, बल्कि पूरे वार्ड में स्वास्थ्य व्यवस्था का ढांचा चरमराया हुआ है। शिकायत पर सीएमएस टीम के साथ तो पहुंचे, लेकिन उन्होंने भी पंखा ठीक होने तक ‘रात काटने’ की सलाह दे डाली। जब बच्चे को आईसीयू में शिफ्ट किया गया, तो वहां भी स्थिति जस की तस मिली। आईसीयू में लगे कई एसी खराब पड़े थे, और सिर्फ एक ही एसी काम कर रहा था।
गार्डों की ‘गुंडागर्दी’ का शिकंजा
अस्पताल में तैनात सुरक्षा कर्मियों का व्यवहार किसी अस्पताल के कर्मचारी जैसा नहीं, बल्कि किसी जेल के वार्डन जैसा है। तीमारदारों के साथ उनका अशिष्ट व्यवहार, कठोर लहजा और धमकाने की प्रवृत्ति ने अस्पताल के माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है। प्रमोद पांडे ने गंभीर आरोप लगाया है कि इन गार्डों को न तो मरीजों के प्रति सहानुभूति का पाठ पढ़ाया गया है और न ही इन्हें यह पता है कि एक तीमारदार पहले ही मानसिक और आर्थिक तनाव में होता है।
प्रशासन और स्वास्थ्य महकमे से सवाल
शिवसेना जिला प्रभारी ने अस्पताल की इन बदहाल व्यवस्थाओं पर तीखा प्रहार करते हुए कहा:
- अमानवीय व्यवहार: सुरक्षा कर्मियों के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि तैनात गार्डों को जनता से बात करने की तमीज नहीं है। उनका कठोर और अशिष्ट व्यवहार मरीजों की परेशानियों को और बढ़ा देता है।
- आम जनता की मजबूरी: यदि सरकारी अस्पतालों की यही दुर्दशा रही, तो लोग मजबूरी में अपनी जमीन-जायदाद बेचकर प्राइवेट अस्पतालों की ओर भागने को मजबूर होंगे।
- प्रशासन की विफलता: सरकार करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन छह लाख की आबादी वाले इस जिले के अस्पताल में न पर्याप्त बेड हैं और न ही मूलभूत सुविधाएं।
प्राइवेट अस्पतालों की जेब भरने की सुनियोजित साजिश?
शिवसेना ने आरोप लगाया है कि यह सब कुछ एक सोची-समझी साजिश के तहत किया जा रहा है। सरकारी अस्पताल की सुविधाओं को इतना बदतर बना दिया गया है कि मरीज मजबूर होकर प्राइवेट अस्पतालों की ओर रुख करें, जहां उन्हें मोटी रकम चुकानी पड़ती है। अपनी जमीन और घर गिरवी रखकर इलाज कराने को मजबूर बस्ती की जनता अब पूछ रही है कि— आखिर सरकारी अस्पताल के बजट का करोड़ों रुपया जा कहाँ रहा है?
आर-पार की चेतावनी
शिवसेना ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि अब यह केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत है। प्रमोद पांडे ने मांग की है कि:
- चिल्ड्रेन वार्ड और आईसीयू की सुविधाओं की तत्काल ऑडिट हो।
- लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
- सुरक्षा कर्मियों को ‘मानवीय व्यवहार’ का प्रशिक्षण दिया जाए।
यदि व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो शिवसेना जिला मुख्यालय पर उग्र प्रदर्शन करेगी। क्या जिला प्रशासन अभी भी कुंभकर्णी नींद में सोता रहेगा, या किसी मासूम की जान जाने का इंतजार किया जा रहा है?
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।














